वीपी का जाना
Sunday, December 7, 2008
विश्वनाथ प्रताप की राजनीतिक हलके में निंदा भी हुी और प्रशंसा भी। मगर जिन लोगों से उनके आत्मीय संबंध थे और उन्हें वीपी को व्यक्तिगत रूप से करीब से जानने का मौका मिला, वे कुछ अलग ही नजरिया रखते हैं। ऐसे एक वरिष्ठ पत्रकार और जनसत्ता के प्रधान संपादक रह चुके प्रभाष जोशी भी हैं। वीपी के निधन के बाद छपे एक लेख में देखिए उनके उदगार। आइए आप भी वीपी के प्रभाष जोशी की नजरों से जानें। उनके लेख का पीडीएफ देखिए।



4 comments:
बहुत बहुत आभार।
आपने बहुत अच्छा किया प्रभाष जोशी का वीपी के बारे मे लिखा लेख पढवा दिया। जोशी प्रभाष जोशी को क्षत्री कहते हैं। वीपी अपने को कुछ भी कह सकतें हैं, राज ठाकरे अपने को खुद ही मर्द एवं शेर कहता है। वी पी का क्षत्री धर्म तब कहां गया था,जब मंडल कमीशन के लागे होने पर 100 से ज्यादा युवक आत्मदाह कर चुके थे एंव वी पी नीरो की तरह चैन से वंशी बला रहे थे।
पूर्व प्रधान मंत्री होने के नाते देख उनका उपचार करा रहा था एवं वह देश पर बोझ थे। गरीब भारत देश में जहां हजारो आदमी बिना उपचार के मर जाते हैं क्या वीपी को सरकारी इलाज पर निर्भर रहना चाहिए था। उन्हे तो देश हित में बहुत पहले इच्छा मृत्यु का वरण कर लेना चाहिए था ।
ईश्वर वीपी की आत्मा को शांति दे
शेष अशोक मधुप से सहमति
वी.पी. सिंह ने कितना भी अच्छा कार्य किया हो लेकिन मंडल मुद्दे से उन्होंने देश का जो नुकसान किया उसके लिए आने पीढियाँ उन्हें कभी माफ़ नही करेगी |
ईश्वर उनकी आत्मा शान्ति दे |
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